Friday, March 6, 2009

कुछ रेडियो जोकी के नाम


आज काल रेडियो जोकी बन्ने का चलन जोरो पर है मगर लोगो को मालूम नही है कि कैसे इससे जुदा जाए जाए । जरुरत है सही सलाह की जो कायदे से तो एक पेशेवेर ही दे सकता है । और इस काम के लिए लिए यदि कोई रेडियो का ही महारथी सामने आए तो ...... तो समझो काम बन गया । रेडियो सिटी से जोधी सिमरन ने यह बीधा उठाया है । इस हेतु उनकी अकेडमी का पता सर्फिंग करते हुए लगा । सही जानकारी तो वेब पर ही मिलेगी। एड्रेस है-www.arm.net.in

क्षनिकाएं

जैसा दोगे , वैसे पयोगे . उठो सेवा करो ,उदार बनो क्योंकि यह जीवन बार बार नही मिलाता .इसका लाभ उठा लो उदार और परोपकारियों को इतिहास सदा सदा के लिए अमर कर देता है . पेट मत बनो , जो सब कुछ निगल जाता है , आँखों बनो जो दूसरो के लिए भी अंशु बहती है.- स्वामी विवेकानंद

आपके सच्चे दोस्त और सुभचिन्तक वे लोग है जो तब भी आप पर यकीं करते है जबकि आप ख़ुद को मुर्ख मानते है.-एर्विन
जो बंधन आपके परिवार को बंधे है जरुरी नही की वहा खून का बंदन हो अगर रिश्तों में आदर और विश्वास हो तो वे हमेशा बंधे रहते है जबकि बंदन दिखाई भी नही परता आप सरीफ सोच कर ही खुश हो सकते है की अकेले ही सब कुछ कर लेंगे लेकिन जब व्यवहार के धरातल पर उतरेंगे तो आपको पैर रखने के लिए जगह नही मिलेगी.(रिचर्ड बीच)
mahaan वैजानिक एडिसन thodha uncha सुनाते थे . एक बार उनके एक मित्र ने मजाक में कहा - एडिसन तुम्हे eeshvar से शिकायत तो होगी की उसने तुम्हें दिमाग तो दिया पर सुनने के शक्ति कम कर दी तो एडिसन हसते हुए बोले - इश्वर ने तो क्रियापा ही की है क्योंकि उसे लगता था की मैं दुनिया की ज्यादा सुनुगा तो बिखर जायूँगा और दिल की सुनुगा तो उभर जायूँगा
क्षनिकाएं -
व्यवस्था
आज कल की व्यवस्था में
इमानदार के हाथ
कटे जा रहे है
घोधों को gur चना
मायास्यर नही है
गधे मिल बाँट कर
पंजरी खा रहा
है
पत्नी धरम
वो अपने पत्नी
होने का धर्म
निभाती रही इसी
तरह
पति रिश्व्रत
लेट पक्रध
जाते रहे
पत्नी रिश्वत
दे कर चुराध्ती
रही
उनका दर्शन
सदा जीवन
उच्च विचार है
सताड इसीलिए
तधक भरक
की दुनिया में उनके
किहि साथी है
न रिश्तेदार है
आदुनिक विधोत्मा
कालिदास को उशत उशत बोलते सुनकर
विधोत्मा कहा आब नरः होती
है
कहती है प्रिये! एकबार तो मंत्री बन जयो
यही तमन्ने मन में बार बार
होती है

प्रतीक्षा


प्रतीक्षा एक भावदशा है... प्रतीक्षा एक अनुभूति है.... प्रतीक्षा एक रास्ता है... जिसके एक chor पर हम होते है ....ठहरे हुए ...औरdusre च्होर पर कोई और होता है .... हम नही जानते कि वोः हमारी ओर आ रहा है॥ या हमसे दूर जा रहा है ...प्रतीक्षा में peer है ...आशु है बैचेनी परन्तु निराशा नही प्रतीक्षा हमेशा जगी रहने वाली आशा का ही दूसरा रूप है । हम सभी प्रतीक्षा रत है ... किसी को अपने आराध्य की प्रतीक्षाहै ....किसी को अपने प्रिये प्रतीक्षा है कोई अपने अच्छे समय की प्रतीक्षा कर रहा है ...तो कोई बस प्रतीक्षा कर रहा है .... न जाने किस की .प्रतीक्षा हमहे तापती है । उतना ही निखारती भी है। आवश्यकता है तो बस धर्य की ।

' ध्रितिर्नाम सूखे दुखे यथा नाप्नोति विक्रियाम!

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Myself Deepak Chaturvedi.have done P.G. IN MASS COMMUNICATOIN & JOURNALISM.I M JACK OF ALL TRADES TYPE.My name means candle which burn itself to give light toothers same with me. "Jahan jayega roshani bekherega,kisi diye ka apna koi makan nahi hota"